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सावित्रीबाई फुले एक ऐसी शिक्षिका, एक ऐसी नारीवादी महिला और एक ऐसी समाजसेविका थीं जिन्होंने कलम के ज़रिये आज़ादी की लड़ाई लड़ी।

उनका जन्म 1831 में महाराष्ट्र में हुआ था। कलम, यानि की शिक्षा ही ‘सावित्री माँ’ का हथियार था, जो औरतों को हज़ारों साल की गुलामी से आज़ादी दिला सकता था। वो ना केवल महिलाओं को, बल्कि दलितों को भी आज़ाद देखने का सपना रखती थीं।

सावित्रीबाई फुले ने भारत में महिलाओं का पहला स्कूल खोला जहाँ ना केवल लड़कियां पढ़ने आती थी, बल्कि वो दलित लड़कियां भी पढ़ने आती थीं जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी थीं, जिन्हें इस जातिवादी समाज ने कभी इंसानी वजूद में स्वीकार ही नहीं।

सावित्रीबाई ने 19वीं सदी में ‘सामाजिक न्याय’ की वो लड़ाई लड़ी, जिसको लड़ने से उस समय के स्त्री-पुरुष सभी घबराते थे। यक़ीनन उनका रास्ता आसान नहीं था।

अपनी लड़ाई के कारण सावित्रीबाई और उनके पति ज्योतिराव फूले का समाज ने एक तरह से बहिष्कार कर दिया था। उन्हें उन्ही के घर से निकल दिया गया था। स्कूल जाने के रास्ते में सावित्रीबाई फूले पर गाय का गोबर फेंका जाता था।

ब्राह्मणों और कथित ऊंची जाति के लोगों को वो फूटे आंख भी नहीं सुहाती थीं। उन्हें अपने इस ‘महान काम’ के लिए पुरस्कार के बजाए गलियां मिलती थीं।

तमाम मुसीबतों के बावजूद सावित्रीबाई ऐसा लड़ी कि दुनिया देखती रह गयी। वो भारत की पहली स्कूल संचालिका बनीं। शिक्षिका होने का असली धर्म निभाते हुए सावित्रीबाई ने अपने छात्रों का हाथ नहीं छोड़ा।

उनके ज़ेहन में बस दो ही बातें थीं- सामाजिक न्याय और लैंगिंक न्याय।

उनकी लड़ाई महिलाओं की पढ़ाई पर ही आकर नहीं रुक गई, बल्कि वहां से शुरू हुई थी।

सावित्रीबाई भ्रूण हत्या के विरोध में थी, कथित ‘अछूतों‘ के इज़्ज़त के पक्ष में थींविधवाओं के पुनः विवाह के पक्ष में थीं,  ब्राह्मणवाद के विरोध में थीं और सतीप्रथा के विरोध में थीं.

महान सामाजिक कार्यकर्ता सावित्रीबाई फूले के कामों को आज भी लोग याद करते हैं। वो भारत की महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत्र हैं।

शिक्षक दिवस पर भरत की पहली महिला शिक्षिका को आज की महिलाओं की तरफ से नमन।

 

– तान्या यादव

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