स्वर्णा

कोसी बराज के फाटक खोल‌ दिए गए हैं। लाल बत्ती जल‌ रही है। बच्चे चूहे खाकर गुजर कर रहें हैं। घर ढह रहें हैं।‌ मकान नहीं, घर। परिवार बह रहें हैं। आदमी मर रहा है। बिहार रो रहा है।
पर क्या फ़र्क पड़ता है?
होता है, चलता है, बिहार है!

पानी की क्राइसिस से ले कर बाढ़ग्रस्त होने तक, बिहार की निरंतर सिसकियाँ आज भी केंद्र सरकार का ध्यान खींचने में नाकाम रहीं हैं। अभी कुछ वक्त पहले चमकी बुखार में बिहार का बचपन तड़प रहा था। पर उससे किसी को क्या?
बच्चे ही तो थे! बाढ़ ही तो है! बिहार ही तो है!

बौद्ध धर्म का जन्मस्थान, बिहार। सीता का उद्गमस्थल, बिहार। नालंदा और मुंडेश्वरी वाला बिहार! छठ महापर्व वाला बिहार!
आनंद कुमार वाला‌ बिहार! लिट्टी-चोखे वाला‌ बिहार! वो‌ बिहार जो आईएएस का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। वो आईएएस जो सफेद अम्बेसडर के होने के बाद बिहार के ही नहीं होते।
वही बिहार जिसकी गुड़-सी भाषा का प्रयोग सिनेमा में केवल हास्य उत्पन्न करने के लिए होता है। और स्क्रीन पर जिसका मूल‌ निवासी भोजपुरी भी पंजाबी लहज़े में बोलता है!

वही बिहार जिसने देश को उसके सबसे पहले राष्ट्रपति दिए, और जिसने भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री की झोली को खाली देख कर उसे 39 लोकसभा सीटों से भर दिया था!

सियासी पारा चढ़ते ही बिहार कॉलेज की सबसे ख़ूबसूरत लड़की हो जाता है। या नया रंगीन टीवी जो गाँव में बस अभी-अभी आया हो। या दो दिन पहले पैदा हुआ बच्चा जिसे सब गोद में ले कर पुचकारना चाहते हों।

ये कभी वोटबैंक हो जाता है, कभी अभिन्न अंग बन जाता है। ‘गर नहीं बन पा रहा है तो बस वो एक राज्य जिसका अस्तित्व भारत के नक्शे के बाहर भी हो। मीडिया भी ज़्यादा आकर्षक नज़रों से नहीं देख पाती है इस दस करोड़ की आबादी वाले राज्य को। अब बिहार ही तो है, कोई मंत्री जी की गाय थोड़ी!

खैर, बूचड़खानों को सब्सिडी पहुँच रही है, प्रशासन सत्ता को बिक चुका है, बाढ़ पीड़ितों को लाई और गुड़ मुहैया हो‌ ना हो, पुलिस बैरक में शराब की पेटियाँ पहुँच गईं हैं, और सरकार का भजन-कीर्तन तो साहब पिछले 70 सालों से हइये है! ऐसे में इंतज़ार है तो बस अब उस एक ट्वीट का जो शिखर धवन के अंगूठे का हाल पूछ ले!

(साभार- स्वर्णा की फेसबुक पोस्ट )