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पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव की कैंपेनिंग चरम पर है मगर राजनीति का स्तर निम्नतर होता जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के बजाय पहले मंदिर मस्जिद पर बहस हुई, अब जाति पर हो रही है।

CM योगी हनुमान जी की जाति बता रहे हैं तो  कांग्रेस वाले राहुल गांधी की गोत्र यानी दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियाँ जातिवादी खेल खेल रही हैं मगर विडंबना है कि जातिवादी होने का ठप्पा सिर्फ शोषित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों पर लगता है।

इसी विषय पर जाकिर हुसैन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर लक्ष्मण यादव लिखते हैं-

”कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में दो राष्ट्रीय पार्टियाँ हर क़दम पर मूलतः ‘जाति’ केन्द्रित चुनाव लड़ रही हैं, जबकि जातिवादी होने का ठप्पा बसपा, सपा, राजद जैसों पर ही लगाया जाएगा।

कोई अपनी जाति बता रहा है, तो कोई अपना गोत्र; कोई किसी को नामदार (परिवारवादी) बोल रहा, तो कोई हनुमान को ही दलित बता दे रहा है। अब आप क्या कहेंगे, कौन जातिवादी है और कौन नहीं?

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‘जाति’ इस मुल्क की एक अकाट्य हक़ीक़त है, जो दहाड़ मारकर अपनी हनक दिखा ही देती है। छुपाए नहीं छुपती।

बस होता ये है कि कुछ का जातिवाद ‘समाज, राष्ट्र व संस्कृति के लिबास में प्रगतिशील टेक्टिस काही जाएगी, जबकि दलित, पिछड़े, आदिवासियों का जातिवाद ही असल ‘जातिवाद’ कहा माना जाएगा।”

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