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दिल्ली में सबकुछ दिल्ली जैसा नहीं है। दिल्ली के अंदर कई ‘दिल्ली’ बसती हैं। दिल्ली में संगम विहार और तुगलकाबाद की वो दिल्ली भी है जो हर साल बरसात में डूबने लगती है।

दिल्ली में वो लुटियन वाली दिल्ली भी है जिसके घास बारहो मास करीने से कटे मिलते हैं। आलम ये है कि सत्ता की कुर्सी पर कोई भी बैठा हो, आपातकाल लगा हो, जंग चल रही हो या भुखमरी फैली हो लेकिन लुटियन दिल्ली की घासों को एक इंच भी बेगैरती से नहीं बढ़ने दिया जाता।

दिल्ली में एक और दिल्ली है, ऊंची-ऊंची और विशाल इमारतों की दिल्ली। ये दिल्ली दूर से देखने पर कॉन्क्रीट के जंगलों जैसी दिखती है। इसके उलट एक झुग्गियों वाली दिल्ली भी है जो दूर से चींटियों के घर जैसी दिखती है।

दिल्ली में कई इलाकों का नाम भी दिल्ली जैसा है। जैसे- पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, चिराग दिल्ली, दिल्ली कैंट…आदि। हम बात करेंगे ‘नई दिल्ली’ की। नई दिल्ली वो क्षेत्र है जिसे देश का इंजन कहा जा सकता है। यहीं से ये तय होता है कि देश में क्या होगा और क्या नहीं। बच्चों के पोलियो ड्रॉप से लेकर परमाणु हथियार तक की नीति यहीं पर बनती है।

नई दिल्ली में ही देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रहते हैं, यहीं प्रधानमंत्री और उनकी पूरी कैबिनेट रहती है। और भी विभिन्न वजहों से महत्वपूर्ण है ये नई दिल्ली।

आज देश के सबसे आधुनिक और कथित पॉश क्षेत्रों में गिने जाने वाली नई दिल्ली सन् 1951 में लोकसभा सीट बनी। जैस दिल्ली में कई दिल्ली हैं, वैसे नई दिल्ली में भी एक नई दिल्ली है। कहने का मतलब ये कि नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के अंदर 10 विधानसभा सीट हैं इनमें से एक सीट का नाम भी नई दिल्ली ही है। इस विधानसभा सीट से विधायक हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री और ‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल। वैसे नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के अंदर आने वाले दसों विधानसभा सीट पर आम आदमी पार्टी के ही विधायक हैं।

तो अब विधानसभा से निकलकर नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में आते हैं और शुरू से शुरू करते हैं-

1952 में आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव हुआ। नई दिल्ली की लोकसभा सीट से मैदान में थीं दो महिलाएं- सुचेता कृपलानी और मन मोहानी सेंघल। दोनों ही स्वतंत्रता सेनानी।

सुचेता कृपलानी ‘किसन मजदूर प्रजा पार्टी’ के बैनर तले चुनाव लड़ रही थी, वहीं मन मोहानी सेंघल कांग्रेस से थी। ये दौर कांग्रेस का था, नेहरू हीरो थें। इस चुनाव में कांग्रेस ने 489 में से 364 सीट जीती थी, दूसरी सबसे बड़ी पार्टी सीपीआई को मात्र 16 सीट मिले थे… लेकिन… लेकिन कांग्रेस नई दिल्ली की सीट हार गई थी।

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सुचेता कृपलानी

सुचेता कृपलानी ने कांग्रेस की मन मोहानी सेंघल को 24860 वोटों से हरा दिया था। इस सीट पर कुल 1,48,359 वोट ही पड़े थे। जिस ‘किसान मजदूर प्रजा पार्टी’ की टिकट पर चुनाव लड़कर सुचेता कृपलानी जीती थीं, वो पार्टी चुनाव से एक साल पहले यानी 1951 में बनी थी। बनाया था जिवतराम कृपलानी ने जिन्हें आचार्य कृपलानी के नाम से जाना जाता है।

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आचार्य कृपलानी

दरअसल आचार्य कृपलानी कांग्रेस से असंतुष्ट थे, तो अन्य असंतुष्टों के साथ मिलकर पार्टी बना ली। इस पार्टी ने पहले ही चुनाव में 16 सीट जीत लिए। नई दिल्ली बहुत महत्वपूर्ण सीट थी इसलिए यहां से आचार्य कृपलानी ने अपनी पत्नी सुचेता कृपलानी को मैदान में उतारा था।

ख़ैर, दूसरे लोकसभा चुनाव तक समीकरण बदल गया। कांग्रेस को मात देने वाली सुचेता कृपलानी ने 1957 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस की टिकट पर लड़ा और भारतीय जनसंघ के बड़े हिंदूवादी नेता बलराज मधोक को हराया। इस चुनाव के बाद सुचेता कृपलानी ने अपना अंतिम लोकसभा चुनाव 1967 में यूपी के गोंडा सीट से लड़ा।

इस बीच वो उत्तर प्रदेश से विधानसभा चुनाव लड़ती रहीं। फिर वो वक्त आया जब देश के किसी राज्य को पहली महिला मुख्यमंत्री मिली। अक्टूबर 1963 में सुचेता कृपलाणी उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, इससे पहले देश के किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं बनी थी।

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बलराज मधोक

उधर 1957 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद बलराज मधोक नई दिल्ली का By Poll चुनाव भी लड़े। 1961 का ये By Poll बलराज मधोक कांग्रेस के जे.बी. सिंह को हराकर जीत गए। लेकिन एक साल बाद हुए 1962 के लोकसभा चुनाव में नई दिल्ली की सीट एक बार फिर कांग्रेस के पास चली गई। बलराज मधोक फिर हार गए। इस हार के बाद बलराज मधोक फिर कभी नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़े।

अविभाजित भारत के गिलगित-बल्तिस्तान में पैदा हुए बलराज मधोक दिल्ली की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे। दिल्ली से ही जम्मू-कश्मीर में हिंदूवादी राजनीति करने की कोशिश की लेकिन असफल रहें। बलराज मधोक ही वो शख़्स हैं जिन्होंने 1951 में ‘संघ परिवार’ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की नींव रखी।

यहां सुचेता कृपलानी और बलराज मधोक की थोड़ी व्याख्या इसलिए जरूरी थी ताकि ये पता चल सके कि नई दिल्ली लोकसभा सीट से कभी भी कोई ऐसा उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ा जिसे ”आम इंसान” कहा जा सके।

नई दिल्ली लोकसभा सीट से हमेशा दिग्गज नेताओं ने ही चुनाव लड़ा है, चाहे वो अटल बिहारी वाजपेयी हों, लालकृष्ण आडवाणी हों, राजेश खन्ना हों, शत्रुधन सिन्हा हों, जगमोहन हों, अजय माकन हों या विजय गोयल हों…

उपर दिए नामों से ये भी क्लियर हो जाता है कि ये सीट सिर्फ कांग्रेस या सिर्फ बीजेपी की नहीं है। यानी किसी एक गढ़ नहीं है। लेकिन समस्या ये है कि इन दोनों पार्टियों के अलाव किसी और पार्टी का भी नहीं।

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1984 से अब तक नई दिल्ली लोकसभा सीट पर कांग्रेस और बीजेपी के अलावा किसी तीसरे पार्टी ने कभी चुनाव नहीं जीता। इस सीट पर 1980 के बाद हुए 9 लोकसभा चुनाव और एक By Poll में से 6 चुनाव बीजेपी जीती है और 4 कांग्रेस। 1984 से पहले भी इस सीट पर कांग्रेस का उन्हीं लोगों से मुकाबला रहा जिन्होंने बाद में बीजेपी बनायी।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र की जनता को कांग्रेस-बीजेपी की राजनीति सूट करती है। इसकी एक वजह ये भी है इस क्षेत्र में रहने वाले ज्यादातर लोग शहरी सवर्ण मानसिकता के हैं। ऐसे में यहां दलित, समाजवादी या वामपंथी राजनीति का उभरना थोड़ा मुश्किल है।

देखिए जरा कौन-कौन सी विधानसभा सीट हैं दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के अंदर-

1. करोल बाग
2. पटेल नगर
3. मोती नगर
4. दिल्ली कैंट
5. राजेंद्र नगर
6. नई दिल्ली
7. कस्तूरबा नगर
8. मालवीय नगर
9. आरके पुरम
10. ग्रेटर कैलाश 

जहां तक इन 10 के 10 विधानसभा सीटों पर ‘आप’ को मिली बहुमत मिलने की बात है तो इसका कारण भी जान लीजिए… खाए अघाए शहरी सवर्णों में रह रहकर क्रांति भी जाग जाती है जिसका परिणाम विधानसभा में आम आदमी पार्टी की बहुमत है। वैसे आम आदमी पार्टी की राजनीति भी बीजेपी-कांग्रेस से बहुत ज्यादा भिन्न नहीं है।

इस सीट से चुनाव लड़ने वाला एक नेता Prime Minister बना और एक Prime Minister In Waiting

एक ही दल, एक ही विचारधारा दो नेता। दोनों अच्छे दोस्त भी थें और दोनों ने अलग अलग समय में नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। लेकिन इनमें से एक प्रधानमंत्री बन गया और दूसरा प्रधानमंत्री बनने का इंतजार करता रह गया।

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अटल-आडवाणी / Pc-IndianExpress

हम बात कर रहे हैं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की। अटल बिहार वाजपेयी पहली बार इस सीट से चुनाव लड़े थें आपातकाल के बाद यानी 1977 के लोकसभा चुनाव में। इस चुनाव में वाजपेयी ने कांग्रेस नेता शशि भूषण को 77186 वोट से हराया था।

वाजपेयी अगला लोकसभा चुनाव भी यहीं से लड़े और जीते। 1980 के इस लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस(आई) नेता सी.एम स्टीफन को हराया था। इसके बाद कभी अटल बिहारी कभी इस सीट से लोकसभा चुनाव नहीं लड़े।

लालकृष्ण आडवाणी 1989 में इस सीट से चुनाव लड़ने आए और कांग्रेस की मोहीनी गिरी को हराकर जीत गए। लेकिन इस सीट से अगला यानी 1991 का लोकसभा चुनाव लड़ना आडवाणी को भारी पड़ गया।

90 का दौर जब आडवाणी की तूती बोलती थी, उसी दौर में राजेश खन्ना फिल्म के बाद राजनीति में भी अपनी चमक बिखेर रहे थे। दोनों दिग्गज 1991 के लोकसभा चुनाव में नई दिल्ली लोकसभा सीट पर आमने सामने हुए। राजेश खन्ना खन्ना को इस सीट से उतारा था राजीव गांधी ने। राजेश खन्ना ने बीजेपी के इस वरिष्ठ नेता को जबरदस्त चुनौती दी।

राजेश खन्ना-राजीव गांधी/Pc- India Today

लालकृष्ण आडवाणी ये चुनाव जीत तो गए लेेकिन बहुत कम मार्जन से। आडवाणी को कुल 93662 वोट मिले थे और राजेश खन्ना को 92073 वोट यानी अंतर मात्र 1589 वोटों का था। कहा जाता है कि इस चुनौती के बाद लालकृष्ण आडवाणी को दिल्ली की सीट छोड़कर गुजरात जाना पड़ा था।

चुनाव जीतने के एक साल बाद ही आडवाणी ने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। फिर 1992 में By Poll हुआ। By Poll में राजेश खन्ना को चुनौती दी अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने लेकिन इस बार राजेश खन्ना जीत गए।

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शत्रुघ्न सिन्हा

इस चुनाव के बाद अगले तीन चुनाव के लिए यह सीट बीजेपी के वरिष्ठ नेता जगमोहन के पास चली गई। जगमोहन ने एक बार राजेश खन्ना को हराया और दो बार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और इंदिरा के खास आर.के धवन को।

1962 से लकर 1984 तक इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे आर.के धवन का पूरा नाम राजेन्द्र कुमार धवन था। कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने जो भी फैसले लिए उसमें संजय गांधी और आर.के. धवन का सलाह शामिल होता था।

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राजेन्द्र कुमार धवन/ Pc- IndianExpress

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री निवास 1 सफदरजंग रोड पर इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने गोली मारी उस समय उनके ठीक पीछे छाता लेकर आर.के.धवन ही चल रहे थे, जो उस हमले में इसलिए बाल बाल बच गए थे कि हत्यारों के निशाने पर सिर्फ इंदिरा गांधी ही थीं।

ख़ैर, नई दिल्ली लोकसभा सीट से आर.के धवन कभी नहीं जीत पाए। 1999 के बाद इस सीट से दो बार कांग्रेस नेता अजय माकन चुने गए लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में अजय माकन तीसरे नंबर पर पहुंच गए। 2009 में अजय माकन ने बीजेपी नेता विजय गोयल को 187809 वोट से हराया था। और 2014 में हालत ये हो गई कि अजय माकन को कुल वोट ही 182893 मिले। यानी जितने वोट से विजय गोयल को हराया था उससे भी 4916 वोट कम पाए।

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आशीष खेतान

इस सीट पर 2014 का लोकसभा चुनाव बीजेपी नेत्री मीनाक्षी लेखी और आप नेता आशीष खेतान के बीच रहा। मीनाक्षी लेखी ने आशीष खेतान को 162708 वोट से हराया था। मीनाक्षी लेखी को 453350 वोट मिले थे और आशीष खेतान को 290642 वोट।

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मीनाक्षी लेखी

अब अशीष खेतान ‘आप’ नेता नहीं हैं। वो पार्टी से इस्तीफा देकर अपनी पढ़ाई पूरी करने लंदन जा चुके हैं। 2019 में आम आदमी पार्टी इस सीट से ब्रजेश गोयल को चुनाव में उतारने वाली है। ब्रजेश गोयल को नई दिल्ली से पार्टी का  लोकसभा प्रभारी बनाया जा चुका है। ब्रजेश पार्टी के ट्रेड विंग के संयोजक हैं।

साफ शब्दों में कहें तो इस सीट का जैसा इतिहास रहा है उस हिसाब से ब्रजेश गोयल सूट नहीं करते। दूसरी तरफ कांग्रेस इस सीट से फिर अजय माकन को ही चुनाव लड़वाने वाली है। अजय दो बार सांसद रह चुके हैं। ऐसे में संभावना है कि नई दिल्ली लोकसभा सीट पर लड़ाई कांग्रेस बीजेपी की बीच ही रहेगी। हालांकि बीजेपी की तरफ से इस सीट पर कौन चुनाव लड़ेगा अभी तय नहीं हुआ है।

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अजय माकन

अजय माकन इस क्षेत्र में बहुत सक्रिय रहे हैं, अब भी हैं। मीनाक्षी लेखी ईद के चांद की तरह साल में एक बार कभी दिख जाती हैं। ऐसे में संभावना ये भी है कि अगर बीजेपी कोई मजबूत दावेदार विकल्प नहीं देती तो अजय माकन को अपनी सीट वापस मिल जाएगी।