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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार एक बात के लिए हमेशा याद रखी जाएगी और वो है इस देश की बैंकिंग व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की बर्बादी। ये सरकार जिस तरह की नीतियों पर अमल कर रही है उस से साफ़ नज़र आ रहा है कि वो बैंकिंग घोटाले करा कर जनता के पैसे से उसकी भरपाई कर रही है।

आईएल एंड एफएस (इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज) बर्बाद होने के कगार पर आ चुकी है। ऐसा नहीं है कि सरकार को इसके बारे में अंदाज़ा नहीं था लेकिन वो मूकदर्शक बनी रही।

आईएल एंड एफएस ग़ैर बैंकिंग वित्तीय सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी है। यह एक सरकारी क्षेत्र की कंपनी है जिसकी 40 सहायक कंपनियां हैं। इसे नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी की श्रेणी में रखा जाता है। जो बैंकों से लोन लेती हैं। इसमें कंपनियां निवेश करती हैं और आम जनता जिसके शेयर ख़रीदती हैं। ये कंपनी बैंकों से लोन लेती है और कई क्षेत्रों में लिए लोन देती भी है।

आईएल एंड एफएस में सरकार की हिस्सेदारी 40.25 प्रतिशत है। भारतीय जीवन बीमा की हिस्सेदारी 25.34 प्रतिशत है। बाकी भारतीय स्टेट बैंक, सेंट्रल बैंक और यूटीआई की भी हिस्सेदारी है।

जब से ये खबर बाज़ार में आई है कि कंपनी कर्ज के तले बुरी तरह दब चुकी है और इसकी रेटिंग गिरा दी गई है तब से शेयर बाज़ार का बुरा हाल है। लेकिन क्या ये सब कुछ अचानक हुआ या सालों से चल रहे बर्बादी के रास्ते की मंजिल है।

अगर पिछले कुछ सालों में कंपनी से जुड़े मसलों पर नज़र डाली जाए तो समझ आता है कि किस तरह से मोदी सरकार ने इसके मामलों को नज़रअंदाज़ किया और अब वो जनता के पैसा से इसकी भरपाई कर देना चाहती है।

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अभी तक आईएल एंड एफएस पर करीब 91 हजार करोड़ रुपए का कर्ज का बोझ है। बीते सोमवार को ही पता चलता है कि पिछले महीने में तीसरी बार आईएल एंड एफएस कर्ज पर ब्याज की किश्त चुकाने में असमर्थ रही है। अब कंपनी की परेशानी ये है कि आगले 6 माह में कंपनी को 3600 करोड़ रुपए से भी अधिक चुकाने हैं। कंपनी के लिए एक और परेशानी ये भी है कि उसने जिन्हें कर्ज दिया है, वो इसे लौटा नहीं पा रहे हैं।

अब सरकार ने इस स्थिति से बचाने के लिए भारतीय जीवन बीमा (एलआईसी) को बुलाया है। लेकिन क्या ये एक संयोग है या फिर इस सब के बारे में पहले से ही सोच लिया गया था। क्या ये सोच लिया गया था कि पहले इस कंपनी को इसके निजी सहयोगी कंपनियों के हाथों बर्बाद होने दो और फिर एलआईसी जिसमें जनता का पैसा जमा है उसे कुर्बान कर दिया जाएगा।

आईएल एंड एफएस पर पिछले तीन सालों में 44% कर्ज बढ़ा है। कंपनी ने 2014 से 2018 के बीच बाज़ार 42000 करोड़ रुपए का कर्ज लिया। जबकि आरबीआई ने इसे लेकर पहले ही चिंता जताई थी। रिज़र्व बैंक के दो अधिकारीयों ने ये बात ‘इकॉनोमिक टाइम्स’ के साथ बातचीत में बताई थी।

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आरबीआई ने आईएल एंड एफएस फाइनैंशल सर्विसेज (IFIN) के कामकाज पर 3 साल पहले ही चिंता जताई थी। आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इस फाइनैंस कंपनी के नेटओेंड फंड्स खत्म हो गए हैं यानी इसकी नेटवर्थ खत्म हो चुकी है और इस पर बहुत ज्यादा कर्ज है।

2015 की ये एनुअल इंसपेक्शन रिपोर्टआईएल एंड एफएस बोर्ड के सामने भी रखी गई थी। लेकिन गुड गवर्नेंस का दावा करने वाली सरकार ने इसपर ध्यान नहीं दिया। और अब जब आईएल एंड एफएस 91,000 करोड़ भार आ चुका है तो सरकार इस तरह से बर्ताव कर रही है जैसे वो अंजान थी।

इस सब के पीछे घोटाले की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है। इस मामले की गहरी जांच होनी चाहिए। बड़ी बात नहीं होगी कि इस सब के पीछे मकसद निजी कंपनियों को फायदा पहुँचाना हो.

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