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जब 2014 में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भारत आए थे तो पीएम मोदी के साथ उनकी मुलाक़ात को बेहद उत्साहपूर्वक दिखाया गया था। मानों सालों पहले बिछड़े दो दोस्त मिल रहे हैं।

लेकिन जो नहीं दिखाया गया वो ये कि, रूस की सरकार द्वारा नियंत्रित एक तेल कम्पनी, भारतीय कम्पनियों के साथ अगले दो वर्षों तक डील साइन करने जा रही थी।

सबसे पहले सितम्बर 2015 और अक्टूबर 2016 के बीच रशियन तेल कम्पनी Rosneft ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों की 49.9% हिस्सेदारी को उत्तरी साईबेरिया और भारतीय तेल कम्पनियों को बेचा। आरोप ये है कि भारत ने ख़रीदी गई हिस्सेदारी के लिए ज़रूरत से ज़्यादा पैसा चुकाया। ऐसा रूस और भारतीय तेल और गैस विशेषज्ञों का मानना है।

फिर इस डील के अंतिम वक़्त में यानी अक्टूबर 2016 में Rosneft ने गुजरात में Essar ग्रुप के मालिकाना हक वाली एक रिफ़ाइनरी और एक बंदरगाह ख़रीदने का एलान किया। इसके लिए जो बेशुमार पैसा एस्सार को चुकाया गया, वो रूस और भारत दोनों के तेल और गैस विशेषज्ञों को हैरान करती है। यानी इसकी क़ीमत सौदे से कहीं ज़्यादा थी।

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ यह भारत और रूस के बीच ऐसी ऐतिहासिक डील थी जिसमें इतना पैसा चुकाया गया जिससे दिवालिया होने की कगार पर खड़ी एस्सार को बचाया। साथ ही डील ने रूस की तेल कम्पनी को बड़े स्तर पर भारतीय बाज़ार में एंट्री भी दी।

लेकिन भारत सरकार द्वारा नियंत्रित सरकारी तेल कम्पनियों का क्या हुआ? क्या उन्हें भी इससे फ़ायदा मिला?

साल 2015 में मिंट में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया कि, सरकारी कम्पनी ONGC ने ROSNEFT से 900 मिलियन डॉलर में वेंकोर ऑयलफ़ील्ड में हिस्सेदारी ख़रीदने की माँग कर रही थी। वेबसाइट Energy Voice के मुताबिक़ ओएनजीसी 15 फ़ीसदी हिस्सेदारी चाहती थी। ये डील सितम्बर 2015 में फ़ाइनल भी हुई लेकिन 1.25 बिलियन डॉलर के भारी भरकम रक़म के साथ।

जून 2016 में तीन और कम्नियों Indian Oil Corporation, Oil India और Bharat Petro Resources (भारत पेट्रोलियम से सम्बंधित) ने 2.1 बिलियन डॉलर में वेंकोर में 23.9% हिस्सेदारी ख़रीदी। कुछ महीनों बाद अक्टूबर 2016 में ONGC विदेश ने 930 मिलियन डॉलर में 11% हिस्सेदारी ख़रीदी। इस तरह भारत की सरकारी कम्पनियों ने कुल 49.9% हिस्सेदारी 4.23 बिलियन डॉलर चुका कर ख़रीदी।

डील विशेषज्ञों को कई कारणों से चौंकाती है। जैसे कि, जब डील की बातचीत चल रही थी तो वेंकोर में तेल का उत्पादन तेज़ी से गिरने लगा । 2014 और 2015 में, क्षेत्र में 22 मिलियन टन तेल का वार्षिक उत्पादन हुआ था। 2016 में, उत्पादन 20.7 मिलियन टन तक गिर गया, जो 2017 में 17.6 मिलियन टन हो गया।  यही नहीं एक वेबसाट के मुताबिक़ ख़ुद ROSNEFT ने माना है कि साल 2020 तक तेल उत्पादन में 13 मिलियन टन की कमी आएगी।

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कम उत्पादन की भरपाई के लिए रूसी कम्पनी ने आस-पास के तेल उत्पादन इलाक़ों पर ध्यान लगाना शुरु कर दिया है।

तेल उत्पादन में कमी के बावजूद ये डील की गई। ऐसा क्यों किया गया ONGC ने अब तक जवाब नहीं दिया है। लेकिन ये डील तब हुई जब रूस अमेरिका और यूरोप से आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा था, यूक्रेन पर सैन्य अभियान की वजह से। यानी रूप पैसों के संकट से जूझ रहा था।

इसलिए ये डील रूस और भारत के तेल और गैस विशेषज्ञों को हजम नहीं हो रही है क्योंकि इसको बेहद ज़्यादा क़ीमत देकर ऐसे वक़्त पर किया गया जब रूस पैसों के संकट से जूझ रहा था। एक एक्सपर्ट लीलिया की मानें तो भारत से पहले चीन डील के लिए बात कर रहा था। लेकिन माहौल समझने के बाद उसने हाथ खींच लिया। फिर आख़िर भारत ने डील क्यों की?

एक तरह से समझा जाए तो दिवालिया होने की कगार पर खड़ी कम्पनी Essar को रूस की कम्पनी Rosneft ने क़ीमत से ज़्यादा रक़म देकर बचाया और दूसरी और Rosneft की हिस्सेदारी को ONGC ने इतनी बड़ी रक़म देकर ख़रीदा जिसने बाज़ार विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया । वो भी तब जब चीन ने ख़तरे का भाँपते हुए अपने क़दम पीछे खीच लिए थे।

सरकार को बताना चाहिए कि ONGC को घाटे का सौदा करने के लिए किसने मजबूर किया? याद रहे कि भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा फ़िलहाल ONGC के डायरेक्टर हैं।

ये ख़बर Scroll.in पर प्रकाशित की गई है।