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विश्व में भारत की नई पहचान बनाने, देश को चाँद पर पहुंचाने, काशी को ‘क्यूटो’ बनाने के नाम पर सत्ता आई नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत को आगे बढ़ाने के बजाए पीछे खिसका दिया। भारत जिस स्तिथि में था उस से भी पिछड़ गया है। इस बात की पुष्टी सरकार द्वारा जारी आंकड़ें सी होते हैं।

नरेंद्र मोदी के बारे में कथित तौर ये कहा जाता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत को विश्व में नई पहचान दिलाई है। लेकिन अगर आर्थिक नज़रिए से देखें तो स्तिथि ये है कि भारत की जो पहचान आज से पाँच वर्ष पहले आर्थिक स्तर पर विश्व में थी वो अब कमज़ोर हो गई है।

क्योंकि इस सरकार के कार्यकाल में देश का निर्यात बुरी तरह पिछड़ा है। पिछली सरकार यानी यूपीए-2 के शासनकाल में देश के निर्यात की विकास दर 10.5% रही। वहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में निर्यात बढ़ने के बजाए इतना ज़्यादा घटा कि निर्यात का विकास दर माइनस में चला गया और -1.7% पर पहुचं चुका है।

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बता दें, कि देश के निर्यात की इस स्तिथि के लिए अर्थशास्त्री नोटबंदी ओए जीएसटी को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। नोटबंदी से नकदी पर चलने वाले देश के असंगठित क्षेत्र यानी छोटे कारखाने और फैक्ट्रियों बुरी तरह बर्बाद हो गए।

इसके कुछ महीनों बाद ही मोदी सरकार ने जीएसटी को बिना तैयारी के लागू कर दिया। जीएसटी आने के बाद देश के निर्यातकों को लेकर नीति बदल गई। दरअसल, पहले निर्यातकों को निर्यात के लिए किसी तरह का कोई टैक्स नहीं देना होता था ये नीति देश के निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए थी। गौरतलब है कि भारत का निर्यात उसके आयत के मुकाबले बहुत कम है।

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लेकिन जीएसटी के बाद कानून बदल गया। अब निर्यातक को टैक्स देना था जिसमें शर्त ये थी कि निर्यात का सामन दूसरे देश तक पहुँचते ही टैक्स का पैसा निर्यातक को वापस कर दिया जाएगा। लेकिन बिना तैयारी के लागू जीएसटी प्रकिर्या सही से काम नहीं कर पाई और निर्यातकों का लगभग 20,000 करोड़ रुपए सरकार के सिस्टम में अटक गए।

महीनों तक निर्यातकों को इस पैसे का इंतेज़ार करना पड़ा। नोटबंदी से पहले से नुकसान में चल रहे निर्यातक को ये झटका भी झेलना पड़ा। उनके पास नकदी की कमी हो गई और वो उत्पादन के लिए बाज़ार में पैसा निवेश नहीं कर पाए जिसके चलते देश का निर्यात बुरी स्तिथि में आ गया।