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मंगलवार 22 जनवरी को जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ में हो रही मुठभेड़ को 4 पत्रकार कवर करने गए थे। वहाँ मिलिटेंट्स और सुरक्षा बलों के जवानों के बीच फ़ायरिंग चल रही थी। पत्रकारों का कहना है कि हम चारों ने जवानों के सामने अपना कैमरा दिखाया और कहा कि हम पत्रकार हैं और घटना कवर करने आए हैं।

इसके बावजूद चारों पत्रकार सेना की पैलेट गन का शिकार हो गए और घायल हो गए

सूबे में पैलेट गन का शिकार न सिर्फ़ वहाँ का आम निवासी होता है बल्कि, बच्चो, बुज़ुर्ग भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। पैलेट गन की शिकार 20 महीनें की मासूम हिबा की तस्वीर ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।

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बहरहाल पत्रकारों पर कश्मीर में हो रहे हमले नए नहीं हैं। आए दिन यहाँ पत्रकारों को ऐसी हालात का सामना करना पड़ता है।

  • 30 अक्टूबर 2018 को ZEE NEWS के साथ काम कर रहे पत्रकार एजाज़ को पुलिस की पैलेट गन का शिकार होना पड़ा। जबकि एजाज़ ने कैमरा दिखाकर बताया था कि वो पत्रकार हैं। एजाज़ के चेहरे, सर और कंधे पर गोली लगी थी।
  • 17 अक्टूबर को श्रीनगर के फतेह कदल इलाक़े में कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिसवालों ने पत्रकारों के साथ मारपीट की। ये पत्रकार भी मुठभेड़ कवर कर रहे थे
  • क्योंकि ये घटना श्रीनगर की थी और काफ़ी हाईलाइट हो गई थी, इसलिए पुलिस ने माफ़ी माँगते हुए जाँच की बात कही। अगर ये मामला एजाज़ की तरह दूर किसी गाँव का होता तो पुलिस अफ़्सोस भी नहीं जताती है।
  • सितम्बर 2017 में एनआईए ने स्थानीय फ़ोटो जर्नलिस्ट कामरान यूसुफ़ को हिरासत में ले लिया। एनआईए ने कहा कि ये रियल जर्नलिस्ट नहीं हैं क्योंकि सरकार के विकास वाले कामों को कभी भी कवर नहीं करते। पर कामरान छूट गए क्योंकि एनआईए के लगाए आरोप कोर्ट में नहीं टिक सके।

इसके अलावा ऐसे कई मामले हैं पत्रकारों के साथ हुई हिंसा, उत्पीड़न से सम्बंधित

यहाँ के स्थानीय पत्रकारों की मानें तो इस वक़्त कश्मीर में पत्रकारिता करना 90 के दशक से भी बदतर है। नाम न छापने की शर्त पर एक पत्रकार कहते हैं कि, पहले पत्रकारों पर हमले होते तो उसमें अज्ञात लोग शामिल होते थे लेकिन अब पत्रकारों को दबाने का काम सरकार की ओर से किया जा रहा है।

हैरानी की बात ये है कि पत्रकारों के साथ आए दिन हो रही हिंसा के बावजूद अब तक किसी भी आरोपी पुलिसवाले को गिरफ़्तार नहीं किया गया है।

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