भाजपा विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल ने अपनी बेटी और दामाद को मारने की कोशिश की थी या नहीं, ये जांच का विषय है और कभी ना कभी स्पष्ट हो जाएगा लेकिन इज़्ज़त के नाम पर पप्पू भरतौल का समर्थन करने वाले लोग खुलेआम हिंसा के लिए लोगों को भड़का रहे हैं, ये अभी ही स्पष्ट हो गया है।

इज़्ज़त और प्रतिष्ठा के नाम पर इस कदर गोलबंदी हो रही है कि पार्टी लाइन के सारे बैरियर टूट जा रहे हैं। इस मामले पर कांग्रेस भले ही अपना कोई स्टैंड नहीं रख सकी है लेकिन ‘जाति विशेष’ के इनके कार्यकर्ता और नेता ‘परशुराम’ बनने पर उतारू हैं, संविधान और कानून व्यवस्था को चुनौती देने को उतारू हैं।

बात-बात पर जातिगत गोलबंदी करने वाले नेता इस जोड़े को विशेष रूप से टारगेट करने के लिए ना सिर्फ गालियों भरे अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि खुलेआम मारने-पीटने और हिंसा करने की धमकी दे रहे हैं।

एक ऐसे ही नमूना हैं- कांग्रेस नेता अभ्युदय नारायण त्रिपाठी, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करते हैं और कांग्रेस से एक लंबे वक्त से जुड़े हुए हैं।

सोशल मीडिया पर अपनी बायोग्राफी में उन्होंने लिखा है कि वो कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के प्रदेश महासचिव भी रहे हैं।

समाज की सच्चाई को ध्यान में रखते हुए ये बात माना जा सकता है कि ऐसे वक्त में तमाम लोग पप्पू भरतौल के साथ हमदर्दी रख सकते हैं। लेकिन यहां मामला हमदर्दी और समर्थन का नहीं खुलेआम कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई जाने का है। क्योंकि साक्षी और अजितेश की पेशी के ठीक एक दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील अभ्युदय नारायण त्रिपाठी फेसबुक पर लिखकर एलान करते हैं कि पुलिस और आर्मी की कितनी भी सुरक्षा लगा दी जाए लेकिन वो साक्षी और अजितेश को जमकर मारेंगे।

14 जुलाई की शाम को फेसबुक पोस्ट लिखते हुए अभ्युदय एलान करते हैं- ‘पुलिस सुरक्षा नहीं पूरी आर्मी लगा दो लेकिन कल इलाहाबाद उच्च न्यायालय परिसर में अगर वो कुलच्छनी साक्षी और गंजेडी अजितेश मुझे दिख गये तो मेरा पूरा प्रयास रहेगा कि मैं उन दोनों को बल भर मारूं !’

वकालत करने वाले इस शख्स का द्वारा किया गया ये ऐलान एक धमकी है, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए।

15 जुलाई की सुबह यह खबर आने लगी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में पेशी के दौरान अजितेश के साथ मारपीट की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस काम को वहां के वकीलों ने अंजाम दिया है। इस खबर के आते ही सोशल मीडिया पर तमाम लोग अभ्युदय नाम के इस शख्स को बधाई देने लगे और दावा करने लगे कि आपने अपना ‘वचन’ पूरा किया।

इसपर अति उत्साहित होता हुआ अभ्युदय अपशब्दों और गालियों भरी एक पोस्ट लिकहते हैं और हिंसक घटना का लीडर होने की अप्रत्यक्ष हामी भरते हैं।

हिंसा की खबर आने के बाद इन्होने लिखा- ###अजितेश और #### साक्षी की कुटाई हेतु सभी अधिवक्ता बंधुओं का हृदय से आभार । कोर्ट के अंदर न्याय और कोर्ट के बाहर सामाजिक न्याय ।

ये पोस्ट ना सिर्फ हिंसा का जश्न मनाने हेतु लिखी गई थी बल्कि ग़लत सूचना भी दे रही थी।

कोर्ट के अंदर जिस तरह के न्याय का दावा किया जा रहा था वो नहीं हुआ बल्कि कोर्ट ने साक्षी और अजितेश के पक्ष में फैसला दिया। यानी न्याय मिलने का दावा साक्षी और अजितेश के पक्ष के लोग कर सकते हैं, पप्पू भरतौल समर्थक पक्ष के लोग नहीं।

दूसरी बात कि कानूनी रूप से बालिग एक लड़की द्वारा लिए गए निर्णय के खिलाफ गोलबंदी, धमकी व और हिंसक झड़प को सामाजिक न्याय कैसे कहा जा सकता है ? जेंडर जस्टिस यानी लैंगिक न्याय के खिलाफ हिंसक एक्शन लेकर सामाजिक न्याय की कौन सी नई परिभाषा गढ़ी जा रही है ?

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर द्वारा संविधान में किए गए प्रावधान और उनका आईपीसी के तहत कानूनी धाराओं के रूप में अवतरण क्या किसी को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है जो इस तरह के लोग हिंसा के जरिए सामाजिक न्याय के दावा कर रहे हैं ?

पेशे से वकील होकर अभ्युदय भले ही न्याय और सामाजिक न्याय को परिभाषित करते रहे लेकिन उन्हें इस देश की न्याय व्यवस्था की ताकत का अंदाजा है शायद इसीलिए कुछ घंटे तक जमकर फुटेज खाने के बाद वो अपने ही बयानों से हटकर सफाई पेश करने लगे और फेसबुक पर लिखा कि- ‘अजितेश को किसने पीटा यह जांच का विषय है।’

पहले पीटने वालों को बधाई संदेश देना और फिर कहना कि ‘किसने पीटा ये जांच का विषय है’, निहायत ही दोहरेपन भरा स्टैंड है।

इस मामले में अभ्युदय की व्यक्तिगत रंजिश इस कदर इस तरह भी देखी जा सकती है कि वो अजितेश का कांटेक्ट नंबर सोशल मीडिया पर शेयर करके सभी को गाली देने के लिए उकसा रहे हैं।

(अजितेश की सुरक्षा के मद्देनज़र कांटैक्ट नंबर दिखने वाली ये पोस्ट नहीं लगाईं गई है )

बात बात के लिए गाली गलौज और हिंसा के लिए उकसाते इस शख्स की कानून की पढ़ाई पर भी सवाल उठता है।

अजितेश के लिए लगातार गाली भरी भाषा इस्तेमाल करने वाले अभ्युदय ने साक्षी के लिए जिस तरह के अपशब्द इस्तेमाल के किए हैं वो ना सिर्फ महिला उत्पीड़न की प्रमुख धाराओं में आता है बल्कि आईटी एक्ट के तहत भी दंडनीय अपराध है।

अब सवाल उठता है कि क्या इस मामले में जाति कनेक्शन जोड़ना जरूरी है ? जवाब मिलता है- हां।

क्योंकि इस शख्स की टाइमलाइन से स्पष्ट हो जाता है कि किसी पिता की गरिमा और इज़्ज़त की रखवाली की बात तो एक बहाना है, दरअसल ये शख्स निहायत ही जातिवादी है।

दो दिन पहले एक फेसबुक पोस्ट के जरिए साक्षी और अभी की शादी कराने वाले पंडित को धमकी दी गई और उसमें ‘ब्राम्हणद्रोही’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। साथ ही दंड देने के लिए इन्होने लोगों को उकसाया।

वकील होने का दावा करने वाले अभ्युदय क्या ये स्पष्ट कर सकते हैं कि संविधान और आईपीसी की धाराओं में कौन सा ऐसा अपराध है जिसमें ‘ब्राम्हणद्रोही’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है ? स्पष्ट है ये सोच देश के संविधान नहीं मनु के विधान के समर्थन से उपजी है।

और ये जातिवाद की ही पराकाष्ठा है कि किसी को धमकाने और मारने के लिए उकसाया जा रहा है। जिस पार्टी के पदाधिकारी रहे हैं और आज भी खुद को कट्टर समर्थक कहते हैं, उसके द्वारा कोई भी स्टैंड ना रखने के बावजूद ये त्रिपाठी जी, बरेली के मिश्रा जी की कथित इज़्ज़त की बागडोर अपने हाथ में संभाले हुए हैं। कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते इस इनकी बातों से तो यह स्पष्ट हो जाता है देश में अराजकता का माहौल बनाने के लिए बीजेपी समर्थक होना जरूरी नहीं है बल्कि जातिवादी या सांप्रदायिक कट्टरता किसी को भी ऐसा बना सकती है।

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