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चुनाव के वक्ता टिकट के लिए नेताओं का पार्टी हाईकमान से बार बार मिलना की खबर तो पहले भी सुनी है। लेकिन इस चुनाव में मामला उल्टा पड़ गया है। हाईकमान टिकट दे रही है मगर नेता जी टिकट लेना को तैयार नहीं हैं। उस विशेष सीट से टिकट न मिले इसे लेकर नेता जी बार बार हाईकमान से पैरवी कर रहे हैं।

जी हां, बात हो रही है केंद्रीय मंत्री और विवादित बीजेपी नेता गिरिराज सिंह की। दरअसल बीजेपी हाईकमान ने गिरिराज की सीट बदलकर नवादा से बेगूसराय कर दिया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एनडीए के बीच सीट बंटवारे में नवादा सीट रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी के खाते में चली गई है।

अब बीजेपी चाहती है कि गिरिराज सिंह बेगूसराय चुनाव लड़े। ऐसा करने के पीछे बीजेपी के पास वाजिब वजह भी है। बेगूसराय सीट पर 2014 में बीजेपी के भोला सिंह चुने गए थे। पिछले साल उनकी मौत हो गई। बेगूसराय सीट पर जीत-हार का फैसाला भूमिहारों के वोट से होती है। भोला सिंह की तरह गिरिराज सिंह भी जाति से भूमिहार है। बीजेपी की नजरों में गिरिराज सिंह हर तरह से बेगूसराय सीट के लिए योग्य उम्मीदवार हैं।

लेकिन गिरिराज सिंह इस सीट से लड़ने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं। पता नहीं उन्हें किस चीज का डर सता रहा है। बात बात पर पाकिस्तान को ललकारने वाले और भारत के लोगों को भी पाकिस्तान भेजने की धमकी देने वाले गिरिराज सिंह अपनी सीट को लेकर भयानक चिंता में है। वो बार बार बीजेपी हाईकमान से अपनी सीट न बदलने की पैरवी कर रहे हैं। वो नवादा से ही लड़ना चाहते हैं।

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बेगूसराय से अपनी उम्मीदवारी से नाराज गिरिराज सिंह लगातार मीडिया में बयान दे रहे हैं कि नवाटा सीट से उनका टिकट काट कर बेगूसराय स्थांतरित किया जाना उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने समान है। गिरिराज सिंह इसके लिए बिहार प्रभारी भूपिंदर यादव और बिहार बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय दोषी मान रहे हैं। हालांकि अभी तक वो खुलकर विरोध नहीं कर रहे हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या सच में गिरिराज सिंह की आनाकानी की वजह आत्म सम्मन है? या मामला कुछ और है। दरअसल बेगूसराय सीट से पूर्व JNSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें बिहार की सभी कम्युनिस्ट पार्टियों का सहयोग प्राप्त है। कन्हैया कुमार भी भूमिहार जाति से ही आते हैं।

जेएनयू में एक आयोजन के दौरान लगे कथित देशविरोधी नारों के बाद कन्हैया कुमार राष्ट्रीय पटल पर छा गए थे। तब से लेकर अब तक वो अपनी भाषण शैली और वाकपटुता से सत्ताधारी बीजेपी को कई मंचों पर धराशायी करते रहे हैं। जेएनयू से अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद कन्हैया लगातार बेगूसराय में है और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रहे हैं। उनकी रैलियों आने वाली भीड़ इस बात की गवाह है कि वो बेगूसराय सीट के मजबूत दावेदार हैं।

वहीं दूसरी तरफ गिरिराज सिंह है जो अभी तक अभी तक बेगूसराय को स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं। चुनाव प्रचार करना तो दूर की बात है। अब राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज है कि गिरिराज सिंह कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से डरे हुए हैं।

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बेगूसराय को लेकर गिरिराज सिंह की आनाकानी का मजाक बनाते हुए कन्हैया कुमार ने ट्वीट किया है कि ‘बताइए, लोगों को ज़बरदस्ती पाकिस्तान भेजने वाले ‘पाकिस्तान टूर एंड ट्रेवेल्स विभाग’ के वीज़ा-मन्त्री जी नवादा से बेगूसराय भेजे जाने पर हर्ट हो गए। मन्त्री जी ने तो कह दिया “बेगूसराय को वणक्कम”’

वैसे कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह के अलावा बेगूसराय सीट के एक और मजबूत दावेदार हैं। महागठबंधन की तरफ से इस सीट पर राजद तनवीर हसन को उतार सकती है। तनवीर हसन जिन्होंने पिछले चुनाव में मोदी लहर के बावजूद करीब 3,69,892 वोट हासिल किए थे। तेजस्वी यादव को पूरी उम्मीद है कि तनवीर हसन राजद को यह सीट जीता सकते हैं।

बेगूसराय का राजनीतिक इतिहास-

एक वक्त था जब बेगूसराय जिला को ‘पूरब का लेनिनग्राद’ कहा जाता था। दरअसल बेगूसराय का इतिहास है कि वहां के भूमिहारों ने वामपंथ का झंडा थामकर ‘जमींदारों’ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। जिनके खिलाफ मोर्चा खोला गया था वह भी भूमिहार थे, जिनका लाल मिर्च की खेती में एकाधिकार था। इस आंदलोन ने बेगूसराय को चंद्रशेखर सिंह, सीताराम मिश्रा, राजेंद्र प्रसाद सिंह सरीखे कई वामपंथी भूमिहार नेता दिया।

इसका प्रभाव ये हुआ कि बेगूसराय जिले के कई विधानसभा वमपंथ का गढ़ बन गएं, जैसे बछवारा और तेघड़ा। कन्हैया कुमार तेघड़ा विधानसभा से ही आते हैं। तेघड़ा को आज भी ‘छोटा मॉस्को’ के नाम से जाना जाता है। तेघड़ा विधानसभा पर 1962 से लेकर 2010 का वामपंथी पार्टियों का कब्जा रहा है। लेकिन बेगूसराय यानी ‘पूरब का लेनिनग्राद’ में CPI एक ही लोकसभा चुनाव (1967) जीती है। तो बेगूसराय का राजनीतिक इतिहास बताता है कि इस लोकसभा में ‘किंग मेकर’ भूमिहार जाति है।