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लंबे इंतजार के बाद आखिकार जनता के सामने भाजपा का घोषणापत्र आ चुका है। भाजपा अपने घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ कहती है। ये शब्द सुनने में थोड़ा साहित्यिक और गंभीर लग सकता है। लेकिन हकीकत इसके ठीक विपरीत है। ऐसा लगता है बीजेपी वादों को पूरा करने का नहीं बल्कि न पूरा करने का ‘संकल्प’ लेती है।

और ये कोई हवा हवाई बात नहीं है। बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि भाजपा ने 2014 के मेनिफेस्टो में 393 वादे किए थे। इसमें से 346 वादों का विश्लेषण किया गया। कुछ वादे दोहराए गए थे इसलिए उन्हें विश्लेषण में शामिल नहीं किया गया।

बीबीसी के विश्लेषण में जो परिणाम आए उसने भाजपा के ‘संकल्प’ की पोल खोल दी। भाजपा 346 में से मात्र 117 वादों को ही पूरा कर पायी है। इनमें भी अभी कई तरह की कमियां और खामियां हैं।

बीजेपी एक दक्षिणपंथी पार्टी है लेकिन इनके 2014 का घोषणापत्र किसी ‘सेंटर राइट’ पार्टी की तरह था। अब स्थिति बदल गई है। 2019 का मेनिफेस्टो घोर दक्षिणपंथी विचारधारा के विष में डूबा हुआ है।

इस बार का घोषणपत्र देखकर बीजेपी के अंदर पैदा हुए व्यक्तिवाद का भी पता चलता है। 2014 में बीजेपी के घोषणापत्र के कवर पर नरेंद्र मोदी समेत 11 वरिष्ठ नेताओं की तस्वीर थी। 2019 के घोषणापत्र के कवर पर सिर्फ एक व्यक्ति की तस्वीर है, वो हैं ‘नरेंद्र मोदी’

2014 के घोषणापत्र की शुरूआत जहां महंगाई, कालाधन, भ्रष्टाचार आदि जैसे मुद्दों से हुई थी, वहीं 2019 के मेनिफेस्टो की शुरूआत आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और वामपंथी उग्रवाद से हुई है।

आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा सुरक्षा जैसे शब्द पहले भी सुने गए हैं लेकिन इस बार बीजेपी ने एक नया शब्द क्वाइन है- “वामपंथी उग्रवाद”

बीजेपी ने शायद इस शब्द का इस्तेमाल नक्सली और माओवादी आंदोलन से जुड़े लड़ाकों के लिए किया है।

इससे पहले किसी राजनीतिक पार्टी में ने कभी भी अपने मेनिफेस्टो में इस शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। खुद बीजेपी के 2014 के मेनिफेस्टो में इस शब्द का कहीं जिक्र नहीं था। 2014 के मेनिफेस्टो में सिर्फ एक जगह उग्रवाद शब्द आता है और एक जगह माओवादी शब्द का। ‘वामपंथी उग्रवदा’ पूरे मेनिफेस्टो में कहीं नहीं लिखा।

बीजेपी के 2014 के घोषणापत्र का पेज नंबर 58

लेकिन इस बार बकायदा एक प्वाइंट इसे डेडिकेट किया गया है। जिसमें लिखा है ‘हमने वामपंथी उग्रवाद के विरूद्ध बहुत सख्त कदम उठाए हैं, जिसके फलस्वरूप इन उग्रवादियों का कार्य क्षेत्र सिमट कर रह गया है। अगले पांच वर्षों में हम इसके विरूद्ध और अधिक कारगर कदम उठाएंगे, जिससे कि अगले पांच वर्षों में कइस खतरे को दूर करने में हम सफल हो सकें। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इस क्षेत्र को हमने विकासक के कार्यों, जिसमें सड़क, मोबाइल फोन, स्कूल, चिकित्सा सेवा शामिल हैं, पांच वर्षों में बहुत प्रगति की है। हम इस कार्य को और ज्यादा गति से चलाएंगे ताकि ये पिछड़े क्षेत्र भी इन सुविधाओं के लाभ से आगे आ सकें।’

बीजेपी के 2019 के घोषणापत्र का पेज नंबर 14

गृहमंत्रालय की वेबसाइट पर भी वामपंथी उग्रवाद का नाम से एक प्रभाग है। इसमें छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य‍ प्रदेश, उत्तर प्रदेश और केरल को वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित माना गया है।

गृहमंत्रालय की वेबसाइट भले ही माओवादियों को विकास विरोधी बता रही हो लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर माओवादी विकास के नाम पर जंगलों और आदिवासियों को उजाड़े जाने के खिलाफ खड़े हैं तो सरकार विकास के नाम पर कॉरपोरेट ताकतों की रक्षा में सुरक्षा बल के साथ तैनात है। माओवादियों की हिंसा के जवाब में सुरक्षा बलों की हिंसा का शिकार भी आदिवासी भी होते हैं…

लेकिन सवाल ये है कि भाजपा ने सिर्फ वामपंथी उग्रवाद का जिक्र क्यों किया है? जाहिर है भारत के अंदर उग्रवाद फैलाने वाले सिर्फ वामपंथी विचारधारा के उग्रवादी नहीं हैं। दक्षिणपंथी उग्रवाद भी है। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद इस उग्रवाद ने खुद को अपराध के नई ऊंचाईयों पर स्थापित किया है।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और नागालैंड से लेकर गुजरात तक शायद ही कोई राज्य होगा जहां गौ-रक्षा नाम पर मॉब लिंचिंग न हुई हो। मोहम्मद अख्लाक से लेकर रकबर खान तक 2014 से 2018 के बीच मॉब लिंचिंग के 134 मामले पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुए। साल 2014 से लेकर साल 2018 तक गोरक्षा के नाम पर हुए 87 मामलों में 50 फीसदी शिकार मुसलमान हुए। क्या मोदी सरकार इसे उग्रवाद नहीं मानती?

जाहिर नहीं मानती! अगर मानती तो मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री बीफ ले जाने के शक में मारे गए अलीमुद्दीन के 8 हत्यारोपियों का फूल माला और मिठाई से स्वागत नहीं करते। जुलाई 2018 में जब ये हत्यारोपी जमानत पर बाहर निकले तब केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने इन आरोपियों का माला पहनाकर स्वागत किया था। साथ ही बीजेपी जिला कार्यालय में मिठाई भी बांटी गई थी।

यूपी के दादरी में गो-मांस की अफवाह की वजह से जिस अखलाक अहमद की हत्या की गई है, उस अखलाक के हत्यारोपी बीजेपी की रैलियों में शामिल हो रहे हैं। इतना ही नहीं यूपी के उप-मुख्यमंत्री उनका स्वागत भी कर रहे हैं।

2019 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गौरक्षा के नाम पर इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या कर दी गई। इस हत्या के लिए बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस, बजरंग दल के कार्यकर्ता आरोपी हैं।

और भी कई ऐसी घटानाएं हुई जिसमें दक्षिणपंथी हिंदूवादी आरोपी और दोषी हैं क्या इसलिए बीजेपी दक्षिणपंथी उग्रवाद को उग्रवाद नहीं मानती?

जहां तक वामपंथ के नाम पर होने वाले उग्रवाद की बात हैं तो अब इसमें ज्यादा जान नहीं बची। माओवादियों का हौव्वा कितना ही क्यों न खड़ा किया जाए, यह सबको पता है कि वो अपने इतिहास के सबसे कमज़ोर क्षण पर खड़े हैं। लेकिन जो उभरकर सामने आया है वो है दक्षिणपंथी उग्रवाद।