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प्रिय एरिक,

ईश्वर शब्द मेरे लिए मानवीय कमजोरी की अभिव्यक्ति से ज्यादा कुछ और नहीं। बाईबिल, आदरणीय लेकिन बचकानी कहानियों के संग्रह से ज्यादा कुछ और नहीं है। इसकी कोई भी व्याख्या, चाहे वो कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो, इनके बारे में मेरे विचार नहीं बदल सकती।

इनकी व्याख्याएं विविधताओं से भरी हैं और मूल लेखन से इनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे सभी धर्मों की तरह यहूदी धर्म भी बचकाने अंधविश्वास के अवतार से ज्यादा कुछ और नहीं है। यहूदी लोग, जिनमें गर्व के साथ मैं भी शामिल हूं और जिनकी मानसिकता से मैं गहराई से जुड़ा हुआ हूं, उनमें ऐसी कोई विशिष्टता नहीं है, जो दूसरे लोगों में न हो।

मैं अगर अपने अनुभव की बात करूं तो यहूदी लोग दूसरे लोगों से किसी भी तरह बेहतर नहीं हैं। हालांकि वो सत्ता विहीन हैं, इसलिए संवेदनाएं उनके साथ हैं। अगर इस बात को छोड़ दिया जाए तो मैं उनमें ऐसी कोई खास बात नहीं देखता जो इस धार्मिक धारणा को सही साबित करता हो कि यहूदी लोग ईश्वर की सबसे प्यारी संतानें हैं।

सामान्य तौर पर मैं इसे काफी दुखदायी पाता हूं कि एक तरह आप विशिष्ट होने का दावा करते हैं। दूसरी ओर आप गर्व के बनावटी दोहरे आवरणों के बीच बचने और छिपने की कोशिश करते हैं। इनमें पहला आवरण बाहरी है जिसमें आप एक व्यक्ति होते हैं, जबकि दूसरा आवरण आंतरिक है जिसमें आप यहूदी हो जाते हैं।

अब मैं खुले तौर पर कहता हूं कि जहां तक बौद्धिक प्रतिबद्धता का सवाल है, हमारे विचार नहीं मिलते, लेकिन मानवीय व्यवहार की मूलभूत बातों पर हमारे विचार एक-दूसरे के काफी करीब हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि अगर हम वास्तविक मुद्दों की बात करें तो हम एक-दूसरे को कहीं बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

एक दोस्ताना शुक्रिया

आपका
ए. आइंस्टीन

(3 जनवरी 1954 को आइंस्टीन ने दार्शनिक एरिक गटकाइंड ये खत लिखा था। जर्मन भाषा में लिखे गए इस खत को 1manatheist.wordpress.com ने हिंदी में अनुदित किया है।)