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प्रजातंत्र एक ऐसी ताकत है जो बहुत सारे बदलाव लाती है। 1951 में हुए पहले चुनाव की तुलना आज के चुनाव से करें तो महिला वोटरों का बढ़ता हुआ प्रतिशत देखा जा सकता है। साल 2014 ऐसे ही बदलाव की गवाही देता है जब 90 करोड़ वोटरों में पचास प्रतिशत भागीदारी महिलाओं ने दर्ज कराई।

भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार ‘आमचुनाव’ को बस एक महीना शेष रह गया है। ऐसे में एक बार फिर महिला वोटरों की बात मीडिया की खबरों का हिस्सा बना हुआ है। पोल एक्सपर्ट प्रणय रॉय और दोराब सोपारीवाला ने अपनी नई किताब ‘द वर्डिक्ट: डिकोडिंग ऑफ इंडियाज इलेक्शन’ में महिला वोटरों के लेकर एक बड़ी चिंता व्यक्त की है।
किताब के मुताबिक, महिलाओं पर उपलब्ध डेटा महिला वोटरों की खराब दशा को दर्शाता है। उन्होंने जनगणना में 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को देखा, और इसकी तुलना मतदाताओं की नई लिस्ट में महिलाओं की संख्या से की। जो पाया गया वो आश्चर्यजनक है।

उन्होंने देखा की कुल 21 लाख महिला मतदाताओं की कमी है या फिर कह सकते हैं कि इन महिलाओं के नाम लापता हैं। तीन राज्य- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान, आधे से अधिक लापता महिला मतदाताओं के लिए ज़िम्मेदार हैं। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों की स्थिति ख़ास तो नहीं लेकिन फिर भी बेहतर है।

विश्लेषकों का कहना है कि 20 लाख लापता महिलाओं का मतलब है कि भारत में हर निर्वाचन क्षेत्र से औसतन 38,000 महिला वोट कम हो जाते हैं। हर पांच सीटों में से एक में 38,000 से कम मतों के अंतर से जीत या हार का फैसला होता है ऐसे में महिला मतदाता चुनाव के परिणाम पर असर डाल सकती है। अगर प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में महिलाओं के मुकाबले पुरुष मतदाताओं की संख्या ज़्यादा रहती है तो ऐसे में महिला मतदाताओं की प्राथमिकता, उनकी ज़रूरते नज़रअंदाज़ हो जाती हैं।

बैडमिंटन स्टार ‘ज्वाला गुट्टा’ का नाम वोटर लिस्ट से ग़ायब, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए सवाल

बीबीसी से ख़ास बातचीत में प्रणय रॉय ने महिला मतदाताओं और उनसे जुड़ी समस्याओं के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने कहा कि, ‘महिलाएं वोट डालना चाहती हैं पर उन्हें ऐसा करने नहीं दिया जाता। ये काफी चिंता का विषय है और ये हमारे सामने कई नए सवाल खोल देता है। हम जानते हैं की इसके पीछे समाजिक कारण हैं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि टर्नआउट को नियंत्रित करके आप परिणामों को नियंत्रित कर सकते हैं। हां, पर क्या ये एकलौता कारण है इसपर हमे विचार करना पड़ेगा।’

भारत में सेक्स रेश्यो पुरुषों के पक्ष में ही रहता है ऐसे में लापता महिलाओं से जुड़ी समस्या एक लम्बे समय से परेशान कर रही है। पिछले साल, एक सरकारी रिपोर्ट में पाया गया कि 63 लाख महिलाएं भारत की आबादी से ‘गायब’ थीं। इसकी वजह बेटे की चाह में कराया गर्भपात और लड़कों को ज़्यादा सहूलियतें मिलना बताया गया।

इसके अलावा अर्थशास्त्री शामिका रवि और मुदित कपूर ने अनुमान लगाया कि 65 लाख से अधिक महिलाएं यानी लगभग 20% महिला मतदाता गायब थीं। इसमें ऐसी महिलाएं शामिल थीं जिन्हें वोट देने के लिए पंजीकृत नहीं किया गया था और वो भी जिन्हें अन्य सामाजिक कारणों से आबादी से बाहर रखा गया।

हालांकि चुनाव निर्वाचन आयोग ने कई कदम उठाए ताकि किसी भी मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से गायब ना हो। डोर-टू-डोर मतदाताओं की जांच की गई और इस कार्य में महिला कर्मचारियों को सबसे अधिक शामिल किया गया। गांवों में बाल कल्याण श्रमिकों और महिलाओं के स्व-सहायता समूहों में महिलाओं को भर्ती किया गया।

साथ ही राज्य में चलने वाले रेडियो और टीवी प्रोग्रामो के ज़रिये महिलाओं को पंजीकरण कराने के लिए प्रेरित किया गया। यहाँ तक की महिलाओं के लिए विशेष पोलिंग स्टेशन भी तैयार हैं।

दिसम्बर 2018 तेलंगाना चुनाव के दौरान बैडमिटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा का नाम वोटर लिस्ट में नहीं था। इस बात के बाहर आने के बाद काफी हंगामा भी हुआ। प्रणय रॉय ने बीबीसी को बताया कि भारत में चुनाव आयोजित करने में मदद करने वाले लोगों का कहना है कि घबराने की कोई बात नहीं है। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने उन्हें बताया कि महिलाओं का नामांकन पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। फिर भी महिलाओं के नामांकन में सामाजिक विरोध सामने आ ही जाता है।

रॉय ने कहा कि उन्होंने ऐसी घटनाए भी सुनी ही जहां शादी के कारण महिअलों का पंजीकरण नहीं कराया जाता। ‘माता-पिता को अपनी बेटी का पंजीकरण नहीं कराने के बारे में सुना है क्योंकि वे उसकी उम्र का खुलासा नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे शादी की संभावनाएं खत्म हो जाएंगी। कई बार हम अपने तरीकों के की वजह से भी महिला वोटरों को आकर्षित करने में असफल हो जाते हैं।’

2019 का लोकसभा चुनाव अब इतना पास है कि इस समस्या के समाधान को ढूंढ़ने तक का समय नहीं बचा। रॉय ने सुझाव देते हुए कहा कि इस समस्या का केवल एक ही विकल्प है कि महलाओं का नाम ना होने के बावजूद भी उन्हें वोट डालने की अनुमति दी जाए। कोई भी महिला जो पोलिंग स्टेशन पर आए और वोट डालने के लिए इच्छुक हो और जो ये साबित कर सके की उसकी उम्र 18 साल है, उसे वोट डालने से नहीं रोका जाना चाहिए।