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आम आदमी का दर्द !

2014 के घोषणापत्र में बीजेपी ने 346 वादे किए थे। क्या वो सब पूरे हो चुके हैं?

346 वादों में 117 काम सरकारी आंकड़ों के हिसाब से पूरे हो चुके हैं, 190 पर काम चल रहा है मतलब धरातल पर नहीं उतरा है, और 39 पर अभी कोई काम ही नहीं शुरू हुआ है। और मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आ चुकी है, जिन 190 वादों पर काम चल रहा है और अभी पूरे नहीं हुए हैं उनपर सरकार का कहना है कि वो शासन व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आख़िर शासन व्यवस्था किसकी झोली में है।

जिन 117 वादों को सरकार पूरा करने का दावा कर रही है क्या वह धरातल पर उतर चुके हैं ?

आयुष्मान योजना का सरकार ने जोर-शोर से प्रचार किया लेकिन जिस बच्ची को पीएम ने आयुष्मान बेबी कहा था उसका इलाज ही नहीं हो पाया।  खास बात तो यह है कि ये 8 महीने की बच्ची आयुष्मान योजना की पहली लाभार्थी थी इसीलिए पीएम मोदी ने इस बच्ची को आयुष्मान बेबी का नाम दिया था। बच्ची के इलाज के लिए उसके मां-बाप 15 दिन से हॉस्पिटल में भटक रहे थे लेकिन सही इलाज नहीं हो पाया।

तो क्या आयुष्मान योजना धरातल पर सही से काम कर रहा है ?

शायद नहीं।

ऐसी कई योजनाएं हैं जो सरकार के हिसाब से तो पूरी हो चुकी हैं लेकिन क्या आम आदमी के लिए धरातल पर उतर सकी हैं ?

आज हम फ़िर समय के एक ऐसे मोड़ पर खडे हैं जहां एक तरफ़ हमारे बिखरे सपनों, टूटी उम्मीदों की दुनिया है और दूसरी तरफ़ बदले हालातों में उम्मीद की एक हल्की किरण। आखिर क्यों हुए हम नाउम्मीद, आज यह समझना जरूरी है जिससे हम नाउम्मीदी के गहरे अंधेरे से उबर सकें।

सच तो यह है कि हम यह कहते नही थकते कि गोरी चमडी वाले अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए वो सबकुछ किया जो उनके हित मे था। किसानों के शोषण से लेकर आम आदमी के शोषण तक जो भी उन्हें ठीक लगा। यही कारण है कि एक तरफ़ आम आदमी की जिंदगी बदहाल होती गई दूसरी तरफ़ अंग्रेजी साम्राज्य की समृध्दि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती गई।लेकिन क्या आजादी के बाद ऐसा नहीं हुआ ?

सच तो ये है कि शोषण की यह व्यवस्था आज भी कुछ दूसरे रूप मे बरकरार है, अंतर सिर्फ़ इतना है कि अब लंकाशायर, मैनचेस्टर का स्थान हमारे महानगरों ने ले लिया है। वरना क्या कारण है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान गन्ने की सही कीमत के लिए हर साल गुहार लगाता है और उसका गन्ना खेतों मे ही सड़ता दिखाई देता है। दूसरी तरफ देश मे चीनी के भाव आसमान छूते हैं। महाराष्ट्र का किसान कपास की उचित कीमत के लिए जब-तब अपनी कमर कसता दिखाई देता है। परन्तु समय समय पर होने वाले संगठित आंदोलन भी बेअसर साबित होते दिखाई देते हैं। छोटे काश्तकारों का तो और बुरा हाल है।

कुछ वर्ष पूर्व इंडियन कौंसिल आफ़ सोशल साइंस रिसर्च के तत्वाधान मे जो शोध उत्तर प्रदेश के ग्रामीण परिवर्तनों के संदर्भ मे किया गया था, उसमें बताया गया था कि खेती पर लोगों की निर्भरता कम होने के बजाय बढ़ी है। गांवों मे सर्वहारों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। इसी कहा जा रहा है कि महंगाई के कारण कीमतें कई गुना बढ़ी हैं लेकिन किसान को उस हिसाब से उसकी फ़सल की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में नौजावनों को रोजगार दिलाने के लिए कई चुनावी वायदे किये थे। मगर इन दिनों भारत में बेरोजगारी का स्तर ये हो गया है कि लोगों को नौकरी तक से निकाला जा रहा है। इस समय टेलीकॉम, आईटी और बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं में नौकरियों की छंटनी जारी है।

अर्थव्यवस्था के आठ प्रमुख गैर-कृषि क्षेत्रों में सिर्फ 2.3 लाख नौकरियां जोड़ी गई हैं। इस आठ सेक्टर में विनिर्माण, निर्माण, व्यापार, परिवहन, आवास और रेस्तरां, आईटी / बीपीओ, शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं। गौरतलब है कि इन सभी सेक्टर में लगभग 2 करोड़ लोग काम करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ ( यूएन ) के इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल की तुलना में बेरोजगारी ज्यादा होगी।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल जो बेरोजगारों की संख्या 1.77 करोड थी वो इस साल 1.78 करोड़ तक जा सकती है।

देखा जाए तो किसान ही नहीं बल्कि आम आदमी की स्थिति उत्तरोत्तर बदहाल हुई है। जो थोड़ी बहुत चमक-दमक दिखाई दे रही है, वह शहरी मध्यमवर्गीय समाज की है जिसने येनकेन अपने को ऐसी स्थिती मे ला खड़ा किया है कि विकास की बंदरबाट मे उसे भी कुछ मिलता रहे। दशकों के तथाकथित विकास की पड़ताल करें तो यह बात पूरी तरह से साफ़ हो जाती है कि स्वतंत्रता के बाद इस देश के हुक्मरानों ने आम आदमी के सपनों को छ्ला है। जो उम्मीदें आम आदमी ने स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर आजाद भारत से लगाई थी, वह तिनकों की मानिंद बिखर कर रह गईं। आज उस पीढ़ी को यह दुख कहीं गहरे सालता है कि क्या इन्हीं दिनों के लिए और ऐसे भारत के लिए उन्होने संघर्ष किया था।

गांधी जी के सपनों का क्या हुआ? कहां गये समाजवाद और समतामूलक समाज के मूल्य? आदर्श, नैतिकता और समर्पण की वह धारा क्यों सूख गई ? कहां से यकायक आ गया फ़रेब, भ्रष्टाचार, अनैतिकता और कुंठा का गहन अंधेरा ?

कहा गया था कि 60 महीनों के अंदर 14 वर्ष तक के सभी नौनिहालों को नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करवाकर शिक्षित कर दिया जायेगा, लेकिन क्या ऐसा हो सका?

इस बीच न जाने कितने शिक्षा आयोग और शिक्षा सुधार के लिए समितियां गठित की गईं, लेकिन सपना अभी भी कोसों दूर है। बल्कि कुछ मामलों मे तो हालात और भी बदतर हुए हैं। बाल शोषण घटने के बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

न्याय आधारित व्यवस्था के स्थान पर हमने ऐसी कुव्यवस्था विकसित की कि आम आदमी अब न्याय की बात सोच भी नहीं सकता। धनबल और बाहुबल ने न्याय को उन इमारतों मे घुसने ही नहीं दिया जहां से न्याय का उजाला फ़ैलना था। न्याय का भ्रम जरूर बना हुआ है।

शायद इसीलिए पुरानी पीढ़ी के बुजुर्ग यह कहने लगे हैं कि इस अंधेरे से कहीं अच्छा था अंग्रेजों का शासन। आखिर अपने स्वतंत्र राष्ट्र और अपनी ही बनाई प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति इतनी घोर निराशा क्यों ?

तमाम बुराइयों से जकड़े इस विशाल लोकतंत्र का यह बदरंग चेहरा न होता अगर स्वतंत्रता के बाद सत्ता मे आए लोगों ने ईमानदार प्रयास किए होते। दर-असल हुआ यह कि जिन चेहरों को ससंद और विधानसभाओं मे पहुंचना था, वह तो अपना सब कुछ न्योछावर कर, सत्ता के लोभ मे न पड़, चुपचाप बैठ गये लेकिन जिन्हें सत्ता सुख का लोभ था, वह भला क्यों पीछे रह जाते।

इन स्वार्थी और धूर्त चेहरों ने बड़ी चालाकी से ईमानदार और राष्ट्रहित मे प्रतिबद्ध लोगों को हाशिए पर डाल दिया। गौर करें तो पहले आम चुनाव से ही यह प्रकिया शुरू हो गई थी। धीरे-धीरे प्रत्येक चुनाव के साथ इनकी संख्या बढ़ती गई और फ़िर शासन की बागडोर पूरी तरह से इन्हीं धूर्त लोगों के हाथों मे आ गई। इन्होनें अपने निहित स्वार्थों के लिए जैसी व्यवस्था चाही, वह आज हमारे सामने है और यही कारण है कि इस व्यवस्था मे ऐसे ही चेहते फ़ूल फ़ल रहे हैं।

दरअसल गांधी जी को इस देश की सही समझ थी और वही थे जो खेत-खलिहान, कल-कारखानों और ग्रामीण भारत की बुनियादी समस्याओं को जानते थे। इसीलिए गांधी जी ने एक बार नेहरू जी से कहा था कि कोई भी फ़ैसला करना तो आंखे बंद करके भारत के किसी गरीब आदमी की तस्वीर अपनी आंखों के सामने लाने की कोशिश करना फ़िर अपने आपसे पूछना कि यह जो निर्णय लिया जा रहा है उससे उसकी आंखों मे चमक आयेगी कि नही। लेकिन ये काम किसी सत्ताधारी ने नहीं किया। न नेहरु जी ऐसा कर सके न मोदी जी कर सके।इसके फ़लस्वरूप विकास का जो ढांचा खड़ा हुआ उसके तहत गरीब का हिस्सा नदारद रहा। रही समाजवाद की बात, वह पानी के बुलबुले की तरह कब गुम हो गया, पता ही नहीं चला।

कुल मिलाकर आज भी ऐसी व्यवस्था कायम है जिसमे अमीर और ज्यादा अमीर, गरीब और गरीब होता जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण की हवा ने भी इन्हें खुशहाली की बजाय बदहाली ही दी है। यही कारण है कि तमाम उपलब्धियों के बाबजूद एक बडा वर्ग बुनियादी जरूरतों से आज भी वंचित है। अलबत्ता दूरदर्शन और सरकारी पोस्टर खुशहाली की रंगीनियां बिखेर रहे हैं। ‘अच्छे दिनों’ की झूठी तस्वीर दिखा रहे हैं।

आज हम फ़िर एक मोड़ पर खड़े हैं। जहां एक तरफ सरकारों और व्यवस्था की नाकामी को ही देश की नियति मान लेने का विकल्प है तो दूसरी तरफ व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष भारी राह चुनने की। दूसरी राह बेहद कठिन है लेकिन समस्याओं का समाधान इसी में है।