चुनाव आयोग के भीतर बग़ावत हो गई है। तीसरे आयुक्त अशोक लवासा ने 4 मई को मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को पत्र लिखा है। उसमें कहा है कि उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि आयोग की संपूर्ण बैठक में शामिल न हो। उनकी असहमतियों को दर्ज नहीं किया जा रहा है। संपूर्ण बैठक में तीनों आयुक्त शामिल होते हैं। हर बात दर्ज की जाती है। मगर यह ख़बर हर भारतीय को परेशान करनी चाहिए कि आयोग के भीतर कहीं कोई खेल तो नहीं चल रहा है।

अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ की गई शिकायतों के फैसले में भी असहमति दी थी। आयोग पर सवाल उठा था कि वह आचार संहिता के उल्ल्घंन के मामले में प्रधानमंत्री का बचाव कर रहा है। हमारे सहयोगी अरविंद गुणाशेखर सुबह से ही यह ख़बर कर रहे हैं।

अशोक लवासा ने अपने पत्र में लिखा है कि आयोग की बैठकों में मेरी भूमिका अर्थहीन हो गई है क्योंकि मेरी असहमतियों को रिकार्ड नहीं किया जा रहा है। मैं अन्य रास्ते अपनाने पर विचार कर सकता हूं ताकि आयोग कानून के हिसाब से काम कर सके और असमहतियों को रिकार्ड करे। बताइये कोई चुनाव आयुक्त लिख रहा है कि आयोग कानून के हिसाब से काम नहीं कर रहा है। हम कैसे अपना भरोसा इस आयोग में व्यक्त कर सकते हैं। यह जनता का चुनाव करवा रहा है या मोदी का चुनाव करवा रहा है। चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का यह पत्र हल्के में नहीं लिया जा सकता है। वैसे ही तमाम तरह के आरोप चुनाव आयोग पर लग रहे हैं। क्या चुनाव मैनेज किया जा रहा है? क्या आयोग पर दबाव देकर फैसले लिखवाए जा रहे हैं। भविष्य में कोई सबूत न बचे इसलिए असहमति दर्ज नहीं की जा रही है।

हमारे सहयोगी अरविंद गुणाशेखर ने लिखा है कि अशोक लवासा के इस पत्र के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने बैठक बुलाई मगर कोई नतीजा नहीं निकला है। सुनील अरोड़ा के तर्क हैं कि सिर्फ क्वासी ज्यूडिशियल मामलों में अल्पमत की राय रिकार्ड की जाती है। आचार संहिता के उल्लंघन पर जो फैसला दिया है वह अर्ध न्यायिक किस्म का नहीं है।हम सब जानते हैं कि ऐसी संस्थाओं की बैठकों में मिनट्स दर्ज होते हैं। प्रधानमंत्री ने इंडियन एक्सप्रेस को कहा है कि कैबिनेट की बैठका का मिनट्स रिकार्ड होता है और उसे मंज़ूर किया जाता है। चुनाव आयोग में ऐसा कौन सा नियम है। सुनील अरोड़ा का जवाब पर्याप्त नहीं लगता है।

चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सतर्क रहने की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री केदारनाथ निकल गए हैं। उस बहाने जल्दी ही हिन्दी चैनलों पर शिव पुराण के कार्यक्रम भर जाएंगे। लेकिन ऐसी ख़बरों को जनता तक पहुंचाने का काम अब जनता का ही है। यह आपके लोकतंत्र के भविष्य का सवाल है। यह समान्य घटना नहीं है। एक आयुक्त लिख रहा है कि चुनाव आयोग कानून से नहीं चल रहा है। फिर हम उस आयोग से कैसे उम्मीद लगाएं कि वह निष्पक्ष चुनाव करा रहा है।