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मीडिया के बड़े वर्ग ने ‘विवादित’ शब्द को ही विवादित बना दिया है। फर्क करना मुश्किल हो गया है क्या विवादित है और क्या नहीं। आए दिन खबरों की हेडिंग में विवादित बयान, विवादित बोल, विवादित नारा, विवादित पोस्टर जैसे शब्द पढ़ने को मिलते रहते हैं।

दरअसल विवादित शब्द को मीडिया ‘सर्टिफिकेट’ की तरह इस्तेमाल करने लगी है। मीडिया में ये तय कैसे होता है कि क्या विवादित है, क्या विवादित नहीं है। शायद मीडिया के मुसोलिनीयों को जो बात पसंद नहीं आती उसे ‘विवादित’ लिख देते हैं।

मीडिया द्वारा विवादित होने का ताजा ‘सर्टिफिकेट’ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे पोस्टर्स को दिया गया है। 6 दिसंबर 2018 बाबरी विध्वंस की 26वीं बरसी पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कुछ पोस्टर्स लगाए गए थे। स्टूडेंट्स एसोसिएशन फॉर इस्लामिक आईडियोलॉजी, एएमयू यूनिट द्वारा लगाए इन पोस्टर्स पर लिखा है…

देश का ‘सविंधान’ उसी दिन ध्वंस हो गया था जिस दिन ‘बाबरी मस्जिद’ गिराई गई थी : शरद यादव

‘अन्याय के खिलाफ उठो… मस्जिद मस्जिद है और अनंत काल तक रहेगी… चलो प्रतिज्ञा करते हैं बाबरी मस्जिद का जल्द पुनर्निर्माण होगा इंशाल्लाह… ऐसा न हो कि हम भूल जाएं’

एएमयू में लगे विवादित पोस्टर
पोस्टर पर कुरान की एक आयत के अलावा कुल इतनी ही बातें लिखी हुई हैं। सवाल उठता है कि इसमे क्या विवादित है? मीडिया को इस पोस्टर में विवादित जैसा क्या दिख गया?

अमर उजाला ने लिखा है-

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बाबरी को लेकर लगे विवादित पोस्टर, प्रशासन में हड़कंप

दैनिक भास्कर ने लिखा है-

अलीगढ़ / एएमयू कैंपस में फिर लगा विवादित पोस्टर, बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की चेतावनी

वन-इंडिया ने लिखा है-

यूपी: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे बाबरी पुनर्निर्माण का विवादित पोस्टर, मचा हड़कंप

दैनिक जागरण ने लिखा है-

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगा दिए बाबरी मस्जिद निर्मार् के पोस्टर, प्रोक्टोरियल टीम ने हटवाए

न्यूज ट्रैक ने लिखा है-

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से फिर उपजा विवाद, चिपके मिले बाबरी मस्जिद पुनर्निर्माण के पोस्टर

इन सभी खबरों में पोस्टर और उनसे जुड़ी जानकारी तो दी गई है लेकिन कहीं भी ये नहीं बताया गया है कि पोस्टर आखिर विवादित क्यों है? ऐसे में पोस्टर विवादित हो या न हो लेकिन ये सभी खबरें जरूर संदिग्ध हो जाती हैं।

क्यों विवादित नहीं है पोस्टर्स?

1992 के पहले भारत में 6 दिसंबर को बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर के महापरिनिर्वाण के रुप में याद किया जाता था। 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को ढहा दिए जाने के बाद से इस तारीख को दो और तरह से याद किया जाने लगा। पहला- शोक दिवस, दूसरा- शौर्य दिवस

शौर्य दिवस मनाने वाले वो लोग हैं जो भारत के संविधान और उसके धर्मनिरपेक्षता की शपथ में यकीन नहीं रखते। वो अल्पसंख्यकों के अधिकार को रौंदने की जाहिलियत को ‘शौर्य’ समझते हैं। बाबरी मस्जिद को तोड़ा जाना भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक कलंक है। और इसलिए बाबरी मस्जिद के संदर्भ में 6 दिसंबर को शोक दिवस ही मनाया जाना चाहिए।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे पोस्टर्स पर लिखा है… अन्याय के खिलाफ उठो
क्या अन्याय के खिलाफ खड़े होना, अन्याय को बर्दाश्त ना करना विवादित है? अगर है तो ऐसे विवाद होने चाहिए।

भूखे का पेट ना ‘हिंदू’ देखता है ना ‘मुसलमान’ ! ना उसे मंदिर चाहिए ना मस्जिद ये बात कब समझेंगे ये नफरती?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे पोस्टर्स पर लिखा है… मस्जिद मस्जिद है और अनंत काल तक रहेगी
क्या सच नहीं है कि जिसे आज विवादित ज़मीन कहा जाता है वो मस्जिद थी, जिसका एक हिस्सा भगवा उग्रवादियों ने तोड़ दिया। जिसे आज विवादित जमीन कहा जाता है वहां 1528–29 से ही बाबरी मस्जिद खड़ी थी। और ये कोई माइथोलॉजी नहीं है, इतिहास है। तो इसमे गलत क्या लिखा, अगर मस्जिद को मानने वाले अपनी मस्जिद की अनंत काल तक रहने की कामना कर रहे हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे पोस्टर्स पर लिखा है… चलो प्रतिज्ञा करते हैं बाबरी मस्जिद का जल्द पुनर्निर्माण होगा इंशाल्लाह

जिस ‘राम मांदिर’ को किसी ने नहीं देखा उसे बनाने की बात हर रोज नेतागण बड़े मंचों से कहते हैं। मीडिया खुद पूछती है कि मंदिर कब बनेगा, नेता कहते हैं जरूर बनेगा, अध्यादेश लागकर बनेगा, कानून लाकर बनेगा, जबरदस्ती बनेगा। बीजेपी के घोषणा पत्र में राम मंदिर की बात है। देशभर में ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ के पोस्टर मिल जाएंगे। ‘कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे’ जैसे नारे तमाम कट्टर हिंदूवादी जलसों के प्रमुख नारों में शुमार रहता है।

अगर इन बातों में कोई विवाद नहीं है, तो जो बाबरी मस्जिद इतिहास का हिस्सा है और वर्तमान में मौजूद है उसके पुनर्निमार्ण की बात करना कैसे विवादित हो गया? मस्जिद टूटी वहाँ फिर से मस्जिद बनाने की बाद विवादित कैसे हो गई? ज़रूरी है कि जहां जो टूटा है, वहां वो बने इसमे कुछ विवाद नहीं है।

मीडिया में बैठ कुछ लोग संविधान की नजर से नहीं अपने धर्म की नजर से सोचते हैं। ऐसे में जो चीज उन्हें सूट नहीं करती उसे विवादित बता देते हैं।

बाबरी विध्वंस में अपाहिज हुआ ‘कारसेवक’ अब मर-मर कर जी रहा है और नेता ‘सत्ता’ के मजे ले रहे हैं

पोस्टर पर एक और चीज लिखी है… ऐसा न हो कि हम भूल जाएं

ये पोस्टर की सबसे जरूरी लाइन है। इंसान को अपनी याददाश्त के प्रति सचेत रहना चाहिए। हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए कि क्या भूलना और क्या कभी नहीं भूलना है। जिस देश में संविधान सबको समान अधिकार देता है। समान अवसर के तमाम प्रयास करता है।

जहां प्रत्येक इंसान के वोट की कीमत एक समान होती है। जहां सबको अपने धर्म को मानने और न मानने का अधिकार मिला हो… वहां एक कौम की आस्था और अधिकार का जो हनन 6 दिसंबर 1992 को हुआ उसे कभी नहीं भूला जाना चाहिए। सिर्फ मुस्लिमों को ही नहीं, पूरे भारत को नहीं भूलना चाहिए। वो देश की धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों के अधिकार पर एक हमला था। उसे अपनी याददाश्त में हमेशा के लिए दर्ज कर लेना चाहिए ताकि जो हुआ वो दोबारा कभी ना हो सके।